देहरादून में शराब कारोबार से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसने बैंक और शराब कारोबारियों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चर्चाओं के केंद्र में आए शराब कारोबारी दिनेश मल्होत्रा, गोलू मल्होत्रा पर आरोप है कि उन्होंने बैंक गारंटी के नाम पर ऐसा खेल रचा, जिससे विभाग को संभावित वित्तीय नुकसान उठाना पड़ सकता था। मामला सामने आते ही विभागीय हलकों में हड़कंप मच गया है।
सूत्रों के अनुसार, संबंधित कारोबारी द्वारा आबकारी विभाग में जो बैंक गारंटी जमा कराई गई थी, उसकी वास्तविकता पर अब प्रश्नचिह्न लग गया है। आशंका जताई जा रही है कि बैंक गारंटी केवल कागज़ों तक सीमित हो सकती है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो इसे सीधे तौर पर बैंक और विभाग, दोनों के साथ धोखाधड़ी की श्रेणी में रखा जा सकता है।
आबकारी व्यवस्था में बैंक गारंटी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। विभाग शराब ठेके आवंटित करते समय ठेकेदारों से बैंक गारंटी इसलिए लेता है ताकि यदि कोई कारोबारी निर्धारित समय पर राजस्व जमा नहीं करता है, तो विभाग उस बैंक गारंटी को भुना कर अपने राजस्व की भरपाई कर सके। यह व्यवस्था सरकार के राजस्व हितों की सुरक्षा के लिए बनाई गई है। लेकिन यदि बैंक गारंटी ही फर्जी या संदिग्ध हो, तो विभाग के पास वसूली का कोई ठोस आधार नहीं बचेगा। वर्तमान मामले में भी यही चिंता सामने आई है। यदि संबंधित कारोबारी द्वारा देय राशि समय पर जमा नहीं की जाती और बैंक गारंटी को कैश कराने की नौबत आती है, तो विभाग को पहले उसकी सत्यता की पुष्टि करनी होगी। अगर गारंटी ही वास्तविक नहीं हुई, तो यह सीधे-सीधे सरकारी राजस्व को खतरे में डालने जैसा होगा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए आबकारी आयुक्त अनुराधा पाल ने सख्त रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। विभागीय सूत्रों का कहना है कि पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच कराई जा रही है और संबंधित बैंक से भी आधिकारिक पुष्टि मांगी जा सकती है। यदि गड़बड़ी की पुष्टि होती है तो न केवल कारोबारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी, बल्कि संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जाएगी।
इधर, शहर में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि मल्होत्रा बंधु इस पूरे प्रकरण के सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में सक्रिय हो गए हैं। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि मामले को दबाने या नरम रुख अपनाने के लिए कुछ प्रभावशाली नेताओं से संपर्क साधने की कोशिश की जा रही है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इससे प्रकरण और भी संवेदनशील हो गया है।
यह पहला मौका है जब आबकारी विभाग और शराब कारोबारियों को लेकर सवाल उठे हों। ऐसे में इस तरह की कथित बैंक गारंटी गड़बड़ी ने निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर भी प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बैंक गारंटी प्रणाली में ही सेंध लगने लगे तो इससे न केवल सरकारी राजस्व को नुकसान होगा, बल्कि ईमानदार कारोबारियों के लिए भी असमान प्रतिस्पर्धा की स्थिति पैदा होगी। ऐसे मामलों में त्वरित और पारदर्शी जांच आवश्यक है ताकि जनता का भरोसा बना रहे।
फिलहाल सभी की निगाहें आबकारी विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला प्रदेश के शराब कारोबार में एक बड़े घोटाले का रूप ले सकता है। वहीं यदि बैंक गारंटी वैध साबित होती है, तो अफवाहों पर विराम लग सकता है। लेकिन तब तक यह प्रकरण देहरादून के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का बड़ा विषय बना रहेगा।


