देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी तबादलों की आधिकारिक समयसीमा भले ही 30 जून को समाप्त हो गई हो, लेकिन स्वास्थ्य विभाग में तबादलों का मौसम अभी भी पूरे शबाब पर है। ऐसा लग रहा है मानो विभाग में ट्रांसफर सीजन का एक्सटेंशन चल रहा हो। पहले बड़ी धूमधाम से तबादला सूची जारी हुई, विरोध हुआ, सवाल उठे, कर्मचारी संगठनों ने मोर्चा खोला, डॉक्टरों ने नाराजगी जताई और अब 10 जुलाई को विभाग को एक और भारी-भरकम संशोधन सूची जारी करनी पड़ गई। इससे यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि आखिर पहली सूची इतनी जल्दबाजी में क्यों बनाई गई थी? स्वास्थ्य विभाग के गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा है—”पहले तबादले करो, फिर विरोध होने पर संशोधन कर दो।” ऐसा लगता है जैसे विभाग ने ट्रांसफर नीति को प्रयोगशाला बना दिया हो, जहां आदेश पहले जारी होते हैं और फिर उनकी समीक्षा शुरू होती है। दरअसल, पहले जारी हुई तबादला सूची ने पूरे स्वास्थ्य महकमे में भूचाल ला दिया था। कई डॉक्टरों ने आदेशों पर सवाल उठाए, कई स्थानों पर विरोध देखने को मिला और सोशल मीडिया पर इस सूची की खूब किरकिरी हुई। आरोप लगे कि तबादले न तो नीति के अनुरूप हैं और न ही जनहित को ध्यान में रखकर किए गए हैं। विपक्ष से लेकर कर्मचारी संगठनों तक ने सरकार और विभाग को कठघरे में खड़ा किया।अब जब संशोधित सूची सामने आई है तो यह खुद इस बात का प्रमाण बन गई है कि पहली सूची में कहीं न कहीं गंभीर खामियां थीं। यदि सब कुछ सही था तो फिर इतनी बड़ी संख्या में संशोधन की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
संशोधित सूची में डॉ. एस धर्मसत्तू को गदरपुर से पिथौरागढ़, डॉ. अमरजीत सिंह शाहनी को पिथौरागढ़ से ऊधमसिंह नगर, डॉ. हिमांशु पांडे को बेतालघाट (नैनीताल) से चंपावत, डॉ. अल्पना मिश्र को पिथौरागढ़ से नैनीडांडा (पौड़ी), डॉ. सुचेता जैन को हरिद्वार से ऋषिकेश, डॉ. प्रदीप कुमार राणा को हरिद्वार से देहरादून तथा डॉ. जीवन प्रसाद को अल्मोड़ा से रानीखेत भेजा गया है। इसी तरह डॉ. संगीता त्रिपाठी को रुद्रपुर से हल्द्वानी, डॉ. प्रभात जोशी को पिथौरागढ़ से ऊधमसिंह नगर, डॉ. उत्तम सिंह खरोला को महानिदेशालय देहरादून से ऋषिकेश, डॉ. निशा रानी को टनकपुर से हल्द्वानी, डॉ. मोनिका श्रीवास्तव को चमोली से देहरादून, डॉ. अनिल कुमार वर्मा को चमोली से हरिद्वार, डॉ. मेहरबान सिंह रावत को रुद्रपुर से हल्द्वानी तथा डॉ. विनीता सियाना को रुद्रप्रयाग से देहरादून स्थानांतरित किया गया है।
इसके अलावा डॉ. भूपेंद्र सिंह नेगी, डॉ. अरुण कुमार सिंह, डॉ. मुकेश सुंदयाल, डॉ. उमा, डॉ. संजीव कुमार सिंह, डॉ. शिखा ठाकुर, डॉ. प्रतीक थापा और डॉ. हितेश कुमार शर्मा सहित बड़ी संख्या में चिकित्सकों के स्थानांतरण आदेशों में भी संशोधन किया गया है। कई डॉक्टरों को पर्वतीय जिलों से मैदानी क्षेत्रों में भेजा गया तो कई को फिर से दुर्गम क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी गई।
चुनावी वर्ष में स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील व्यवस्था के साथ इस तरह के प्रयोग कई सवाल खड़े कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि लगातार तबादलों और संशोधनों से अस्पतालों की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है। मरीजों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है, क्योंकि अधिकारी और चिकित्सक अपने नए कार्यस्थल को लेकर असमंजस में रहते हैं।
विभाग के गलियारों में अब यह तंज भी सुनाई देने लगा है कि “स्वास्थ्य विभाग में ट्रांसफर आदेश अंतिम नहीं, बल्कि ड्राफ्ट कॉपी माने जाते हैं।” पहले आदेश निकलता है, फिर फोन आते हैं, सिफारिशें होती हैं, विरोध होता है और आखिर में संशोधन सूची जारी हो जाती है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि संशोधन ही करना था तो पहली सूची जारी करने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी? क्या विभाग ने पहले ही सभी पहलुओं पर विचार नहीं किया था, या फिर विरोध के दबाव ने पूरे सिस्टम को बैकफुट पर ला दिया? फिलहाल इतना तय है कि स्वास्थ्य विभाग के तबादलों ने एक बार फिर यह संदेश दे दिया है कि यहां आदेशों से ज्यादा उनकी “संशोधन सूची” चर्चा में रहती है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या यह संशोधित सूची अंतिम साबित होगी, या फिर आने वाले दिनों में स्वास्थ्य विभाग एक और नया अध्याय लिखते हुए “संशोधन भाग-दो” भी जारी करेगा। फिलहाल स्वास्थ्य महकमे में यही चर्चा है कि यहां तबादले कम और तबादलों के तबादले ज्यादा हो रहे हैं।

