जब ऑल इज वेल तो फिर कतारें क्यों हैं ? और अफवाह है तो बंदिश क्यों नहीं?

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लोकसभा में देश को भरोसा दिलाया जा रहा है कि, बेशक मध्यपूर्व एशिया बारूद की गंध से महक रहा हो लेकिन अपने यहां ऑल इज वेल है। संसद में हों या इधर उत्तराखंड का गैरसैंण विधानसभा भवन, हर जगह मौजूदा हालात को देखते हुए संजीदा सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष पेट्रोल-डीजल और एलपीजी का मुद्दा उठा रहा है।

हालांकि लोकसभा में केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप पुरी दो टूक कह चुके हैं कि देश में पेट्रोल,डीजल, कैरोसीन और एलपीजी की कोई कमी नहीं है। मंत्री जी ने तो यहां तक बताया कि मुल्क में एलपीजी उत्पादन में 28 फीसद का इजाफा भी हुआ है. इधर उत्तराखंड में भी बजट सत्र के दौरान गैरसैंण में एलपीजी को लेकर काफी गहमागहमी हुई. विपक्ष ने एलपीजी का मुद्दा उठाया तो सरकार ने भी खुलकर कहा कि एलपीजी की कोई कमी नहीं है और ईंधन के संभावित विकल्पों पर भी फोकस किया जा रहा है.

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हालांकि शहर बाजार और गांव देहात में हकीकत कुछ और ही दिख रही है। गैस एजेंसियों में लोगों की कतारे लगी हुई हैं। शहरों में बुकिंग के 25 दिन बाद और दुर्गम गांवों में गैस डिलीवरी का मानक 45 दिन का बना दिया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर कोई कमी नहीं है तो फिर मुल्क में अफरातफरी का माहौल क्यों ? अगर वाकई में एलपीजी उत्पादन में 28 फीसद की बढोत्तरी हुई है तो अवाम के माथे पर चिंता की लकीरें क्यों हैं.

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आल इज वेल है तो अचानक से नियमों में बदलाव क्यों हुआ जनता अपने चूल्हे को लेकर परेशान क्यों हो रही है। आखिर सरकारी बयानो पर जनता को ऐतबार क्यों नहीं हो रहा । शहर कस्बों में लोग सहमे हुए क्यों है. गैस एजेंसियों के बाहर भीड़ क्यों बढ़ रही है. अगर अफवाह सुकून छीन रही है तो उस पर बंदिश लगाने का पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किया जा रहा

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