सोशल मीडिया में वॉयरल इस वीडियो को गौर से देखना और फिर सोचना समझना कि आंदोलन से उपजे इस उत्तराखंड को हम कहां ले जा रहे हैं। जब से ये राज्य बना है हर सरकार ने इस राज्य में अपनी सोच के मॉडल में ठूंसने की कोशिश की है। ऊर्जा प्रदेश से लेकर हर्बल प्रदेश तक, सोलर प्रदेश से लेकर पर्यटन प्रदेश तक। राज्य की तरक्की के लिए कई तरह के प्रयोग जारी हैं। सोशल मीडिया पर वॉयरल ये वीडियो ऋषिकेश का बताया जा रहा है। जो सैलानी आए हैं वो हरियाणा के बताए जा रहे हैं। बहरहाल बड़ा सवाल ये है कि हम इस राज्य में कैसे पर्यटन को बढ़ावा दे रहे हैं।
मां गंगा जिस पर करोड़ों करोड़ हिंदुस्तानियों की आस्था है उस गंगा के तट पर ये सैलानी शराब पीने की जिद कर रहे हैं। पुलिस से उलझ रहे हैं गालियां दे रहे हैं। हम ऐसे सैलानियों को अतिथि कहें तो कैसे कहें, ये अतिथि हमारी देवभूमि के लिए कतई देवता नहीं हो सकते, ये मेहमान हमारी सभ्यता संस्कृति के लिए खतरा हैं। हमारी मां बहिन मां गंगा के पानी से आचमन करती है उसे शराब में नहीं मिलाती और न कभी उसके किनारे बैठ कर सुरा पीने की कोशिश करेगी। लेकिन इतना तय है कि अगर ऐसे मेहमानों की मेजबानी होती रही तो इसका साइड इफैक्ट बेहद खतरनाक होगा। हमारी संस्कृति भी प्रदूषित हो जाएगी, ये वीडियो साबित कर रहा है कि ऐसे सैलानियों की वजह से देवभूमि उत्तराखंड में सांस्कृतिक प्रदूषण का खतरा मंडरा रहा है।
इन हालातों में तो सरकार को अतिथियों के लिए भी मानक बनाने को मजबूर होना पड़ जाएगा। वैसे भी उत्तराखंड देवभूमि है हमे तीर्थाटन और पर्यटन के बीच के फर्क को न केवल समझना होगा बल्कि समझआना भी होगा। वरना कहीं ऐसा न हो कि हम सांस्कृतिक प्रदूषण की चपेट में आते हुए धीरे-धीरे बैंकाक और थाईलैंड वाले पर्यटन के रास्ते पर न चलने लगे। क्योंकि हमारी अनदेखी ही छोटी नदियों को नाले में बदल देती है और फिर गंदे नाले में ।
कब जहर घुलकर शहर गांव को जहरीला बना दे इसके लिए नजरेंइनायत करनी होंगी मानक बनाने होंगे ताकि देवभूमि बचे रहे। सीधी सी बात है हमे सभ्य सैलानी चाहिए अराजक अमीर शोहदे नहीं। क्योंकि खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। लिहाजा जरूरत है नजरें इनायत करने की ,सभ्यता संस्कृति बचाने की और जल जंगल जमीन बचाने की ताकि देवभूमि महफूज रहे।

