राजधानी देहरादून स्थित धौलास इन दिनों सियासी अखाड़ा बना हुआ है, सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच धौलास भूमि आवंटन ने ऐसा युद्ध छेड़ा जिसने प्रदेश राजनीति को पूरी तरह से गरमा दिया है। बीते विधानसभा चुनाव हों या आगामी 2027 विधानसभा चुनाव धौलास भूमि विवाद ने हर बार चुनावी चोट पर धर्म और जाति का नींबू निचोड़ा है। दरअसल, राज्य गठन होने के बाद साल 2004 के समय जब नारायण दत्त तिवारी की कांग्रेस सरकार सत्ता में थी तो उस समय कांग्रेस सरकार द्वारा शेखुल हिंद एजुकेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट को धौलास में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान खोलने के लिए भूमि आवंटित की गई थी। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ महमूद असद मदनी है, जिनका संबंध दारुल उलूम और जमीयत उलेमा ए हिंद से है।
वहीं नारायण दत्त तिवारी की कांग्रेस सरकार ने उक्त ट्रस्ट जिसका पता 1 बहादुर शाह जफर मार्ग दिल्ली बताया गया है, उसे भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून के पास इस्लामिक शिक्षण संस्थान खोले जाने की प्रारंभित अनुमति दी थी। कहा जाता है कि ट्रस्ट यहां देवबंद दारुल उलूम की तरह विशाल मदरसा या मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाने जा रहा था, जिसके लिए ट्रस्ट द्वारा 20 एकड़ भूमि ग्राम हरियावाला धौलास में भूमिहर किसानों, ग्राम समाज और वन विभाग की सरकारी विभागों की भूमि पर भी कथित रूप से कब्जा कर आवंटित किया गया था।
भाजपा कर रही एक तीर से कई निशाने
वहीं भाजपा भी धौलास भूमि विवाद को तीर बनाकर एक साथ कई निशाने साधती नजर आ रही है, चूंकि यह विषय सीधे पार्टी के मूल वैचारिक एजेंडे में शामिल राष्ट्रवाद, सैन्य सम्मान और हिंदुत्व से जुड़ा है, लिहाजा IMA जैसे संवेदनशील सैन्य संस्थान के पास जमीन आवंटन का मुद्दा उठाकर भाजपा इसे देश की सुरक्षा से जोड़ रही है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस सरकार के इस फैसले ने स्वयं कांग्रेस को एक बार फिर तुष्टीकरण की राजनीति के कटघरे में खड़ा कर दिया है।
वर्ष 2022 में मुस्लिम यूनिवर्सिटी विवाद को भाजपा ने जिस तरह चुनावी तौर पर भुनाया था, धौलास का यह मामला उसी राजनीतिक पटकथा की अगली कड़ी जैसा दिखाई पड़ता है, सीधे तौर पर कहा जाए तो भाजपा यह संदेश देने का प्रयास कर रही है कि कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2004 में सुरक्षा को नजरअंदाज कर समुदाय विशेष को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया था। वहीं भाजपा अभी से इस मुद्दे के सहारे पार्टी के कोर वोट बैंक को अधिक लाभ पहुंचाने की जुगत में लगी नजर आ रही है।
अग्निपथ पर उतरी धामी सरकार, कसौटिआं अपार
धौलास भूमि विवाद अब भाजपा के लिए जीत का अवसर भी है और बड़ी परीक्षा भी,,,, दरअसल, भाजपा विधायक व प्रदेश प्रवक्ता विनोद चमोली की मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात, जमीन आवंटन रद्द करने की मांग और देवभूमि में विधर्मियों की मंशा नहीं चलने देंगे जैसे बयानों से भाजपा ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह मामला भाजपा के लिए प्रदेश की सुरक्षा व सांस्कृतिक पहचान को बचाने का विषय है। वहीं धौलास भूमि विवाद को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी खुलकर आगे आए और उन्होंने जनता को आश्वासन दिया कि इस प्रकरण में शीघ्र कार्रवाई करी जाएगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा धौलास भूमि मामले पर यथाशीघ्र कार्रवाई करने का आश्वासन दिया जाना राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि भाजपा सरकार भूमि को सरकारी कब्जे में लेती है तो, भाजपा इसे अपनी वैचारिक व राजनीतिक जीत के रूप में पेश करेगी। हालांकि, अगर मामला कोर्ट में उलझता है या कानूनी जटिलताओं के कारण सरकार पीछे हटती है, तो विपक्ष इस पर पलटवार भी कर सकता है। इसलिए यह मुद्दा भाजपा के लिए अवसर है और बड़ी परीक्षा भी।
बहरहाल, हाई कोर्ट के स्पष्ट निर्णय को बावजूद भी कांग्रेस सरकार द्वारा इस फैसले की पैरवी करना अब कांग्रेस के गले की हड्डी बन चुका है। वहीं यह मुद्दा मुख्यमंत्री धामी और भाजपा के लिए एक बड़ी परिक्षा बनकर उभरा है, जिसका परिणाम उत्तराखंड की राजनीति पर गहरा असर डालेगा।


