गैरसैंण में चल रहे उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र में अफसरशाही का मुद्दा जोरदार तरीके से गूंजा। कांग्रेस विधायकों ने अधिकारियों की मनमानी का आरोप लगाते हुए विशेषाधिकार हनन का मुद्दा उठाया और सरकार को कटघरे में खड़ा किया। विपक्ष का आरोप है कि अधिकारी जनप्रतिनिधियों की बात तक नहीं सुन रहे और सदन की पीठ द्वारा दिए गए निर्देशों का भी पालन नहीं हो रहा। बजट सत्र के दौरान कांग्रेस विधायक प्रीतम सिंह, हरीश धामी, अनुपमा रावत और प्रदीप बत्रा ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। विधायकों का आरोप है कि कई मामलों में अधिकारियों ने न तो जनप्रतिनिधियों के फोन उठाए और न ही उनके मुद्दों पर कोई कार्रवाई की।
कांग्रेस विधायक प्रीतम सिंह ने सदन में कहा कि विशेषाधिकार हनन के कई प्रस्ताव पहले भी आए हैं और विधानसभा की पीठ ने कई बार सरकार को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए। लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन निर्देशों का पालन तक नहीं हो पा रहा। विधायकों का आरोप है कि हालात इतने गंभीर हैं कि सदन की पीठ और यहां तक कि राज्यपाल के प्रोटोकॉल का भी उल्लंघन हो रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकार प्रदेश को किस दिशा में ले जा रही है।
ताजा मामला उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड, देहरादून के प्रबंध निदेशक से जुड़ा बताया गया। आरोप है कि निगम के एमडी ने जनप्रतिनिधियों की बात तक सुनने की जहमत नहीं उठाई और फोन तक नहीं उठाए। इस पर विपक्ष ने कड़ी नाराजगी जताई और अधिकारियों के रवैये पर सवाल खड़े किए।
विधायक हरीश सिंह धामी ने तो इस मुद्दे पर अनशन तक की चेतावनी दे डाली। उन्होंने कहा कि अगर अधिकारियों का रवैया नहीं सुधरा तो उनके कार्यालय का घेराव किया जाएगा। धामी ने साफ कहा कि अगर इस दौरान कोई अप्रिय घटना होती है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी।दरअसल, प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है कि वे जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय बनाए रखें। अधिकारी सरकारी योजनाओं को लागू करने, जनता की समस्याओं का समाधान करने और विधायकों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर समय पर कार्रवाई करने के लिए जवाबदेह होते हैं।
इसके अलावा अधिकारियों को विधानसभा और सरकार के निर्देशों का पालन करना, संवैधानिक पदों के प्रोटोकॉल का सम्मान करना और पारदर्शी तरीके से प्रशासनिक कामकाज चलाना भी उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि कई अधिकारी इन जिम्मेदारियों को नजरअंदाज कर रहे हैं, जिससे न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं बल्कि जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी कमजोर हो रही है। इस मुद्दे को लेकर सदन में विपक्ष ने जोरदार विरोध जताया और “शेम-शेम” के नारे लगाए। विपक्ष के तेवर देखकर सरकार को भी कई बार असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने संसदीय कार्य मंत्री सुबोध उनियाल को इस पूरे मामले में आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए। फिलहाल, गैरसैंण के बजट सत्र में उठा यह मुद्दा अफसरशाही बनाम जनप्रतिनिधियों की बहस को फिर से तेज कर गया है। अब देखना होगा कि सरकार अधिकारियों के रवैये पर क्या कार्रवाई करती है और क्या इस विवाद का कोई ठोस समाधान निकल पाता है या नहीं।

