इन दिनों सत्ता और सिस्टम के गलियारों में एक बेहद चिंताजनक चलन चर्चा का विषय बना हुआ है। अधिकारियों को धमकाकर, डराकर या दबाव में लेकर काम करवाने की प्रवृत्ति अब कुछ खबरनवीसों के लिए जैसे एक सुनियोजित एजेंडा बन चुकी है। खास तौर पर एक जोड़ी को लेकर चर्चाएं तेज हैं, जिनका तरीका, समय और पहुंच — तीनों ही कई सवाल खड़े कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह जोड़ी रोजाना बिल्कुल सरकारी समय पर सिस्टम की सबसे बड़ी संस्था में दाखिल होती है। शुरुआत होती है कानापूसी से—किससे क्या कहना है, कौन सा मुद्दा उठाना है और किस अधिकारी को किस अंदाज में साधना है। इसके बाद सीधे बड़े अधिकारियों के कक्ष में पहुंचकर अपनी कच्ची-पक्की सूचनाओं को ऐसे परोसा जाता है मानो वही अंतिम सत्य हो। सूत्रों की मानें तो यह सिलसिला कुछ मिनटों का नहीं, बल्कि घंटों चलता है, जिससे न सिर्फ अधिकारियों का समय बर्बाद होता है बल्कि नियमित सरकारी कामकाज भी बुरी तरह प्रभावित होता है।
चर्चा सिर्फ दखलअंदाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि बात धमकी और दबाव तक पहुंच चुकी है। सिस्टम से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इस जोड़ी ने हाल ही में एक बड़े अधिकारी को सीधे-सीधे यह इशारा दे दिया कि उनकी कुर्सी सुरक्षित रहेगी या नहीं, यह उनके बताए काम पर निर्भर करता है। यहां तक कहा गया कि पहले भी एक अधिकारी से विभाग की जिम्मेदारी वापस ली जा चुकी है और अगर ‘सहयोग’ नहीं मिला तो अगला नंबर किसी और का भी हो सकता है।
सबसे गंभीर सवाल यही है कि आखिर खबरनवीसों की एक जोड़ी में इतनी हिम्मत कहां से आ रही है? क्या यह सिर्फ पत्रकारिता की आड़ है या फिर किसी बड़े खेल का हिस्सा? सिस्टम के जानकार मानते हैं कि इतनी खुली धमक तभी संभव है जब या तो अधिकारी की कोई कमजोर नस दबाई गई हो, या फिर वह अधिकारी इन लोगों के प्रभाव में आ चुका हो। दोनों ही स्थितियां लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासनिक निष्पक्षता के लिए बेहद खतरनाक हैं।
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सवाल उठाना, सच सामने लाना और जनहित की रक्षा करना है। लेकिन जब वही पत्रकारिता डर, सौदेबाजी और कुर्सी बचाने-गिराने का औजार बन जाए, तो यह न सिर्फ पेशे की गरिमा को चोट पहुंचाती है बल्कि पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर देती है। ऐसे में ईमानदार अधिकारियों के मनोबल पर भी गहरा असर पड़ता है, जो बिना दबाव के काम करना चाहते हैं।
अब सवाल यह है कि क्या सिस्टम इस हिमाकत को यूं ही नजरअंदाज करता रहेगा? या फिर ऐसे कथित खबरनवीसों की भूमिका और मंशा की गंभीर जांच होगी? क्योंकि अगर आज एक अधिकारी को धमकाया जा सकता है, तो कल पूरा प्रशासन इस तरह के दबाव तंत्र का बंधक बन सकता है। और तब नुकसान सिर्फ कुर्सियों का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का भी होगा।


