आयुक्त आबकारी का सख्त संदेश “व्यापार सुगम, सरकार समृद्ध—आबकारी विभाग की दोहरी रणनीति”…..

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देहरादून। उत्तराखंड में आबकारी विभाग एक बार फिर नए मुकाम पर दिखाई दे रहा है। आबकारी नीति के तहत जहां एक ओर व्यापारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए योजनाएं तैयार की गई हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी राजस्व में बढ़ोतरी को भी प्राथमिकता दी जा रही है। लक्ष्य साफ है—व्यापार को सुगम बनाना और खजाने को मजबूत करना। राजधानी देहरादून में तीन मदिरा दुकानों के लिए निर्धारित समयावधि में आवेदन प्राप्त नहीं होने के बाद विभाग ने अब प्रक्रिया तेज कर दी है। इनमें राजपुर रोड पर आरटीओ कार्यालय के निकट प्रस्तावित दुकान, परेड ग्राउंड क्षेत्र स्थित दुकान और जीएमएस रोड स्थित मदिरा दुकान शामिल हैं। इन दुकानों को लेकर विभाग सक्रिय मोड में आ गया है ताकि राजस्व हानि न हो और वित्तीय वर्ष 2026-27 तथा 2027-28 के लिए अधिकतम आय सुनिश्चित की जा सके। आबकारी आयुक्त अनुराधा पाल ने इस संबंध में आवश्यक आदेश जारी किए हैं। निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि जिन दुकानों के लिए आवेदन नहीं आए हैं, उनके लिए पुनः प्रक्रिया अपनाई जाए और नियमानुसार कार्रवाई करते हुए राजस्व सृजन को प्राथमिकता दी जाए। विभाग का मानना है कि पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया से सरकार को अधिक लाभ मिल सकता है।
सूत्रों के अनुसार नई नीति में व्यापारियों को स्थिरता देने के साथ-साथ राजस्व वृद्धि के लिए प्रावधानों को मजबूत किया गया है। नवीनीकरण प्रक्रिया को व्यवस्थित करने और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि दुकानों के आवंटन से सरकार को अधिक मूल्य प्राप्त हो सके। इससे न केवल राज्य की आय बढ़ेगी, बल्कि शराब कारोबार से जुड़े व्यापारियों को भी स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलेंगे।
आबकारी आयुक्त का कहना है कि नीति का उद्देश्य किसी एक वर्ग को लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि संतुलित व्यवस्था के माध्यम से पारदर्शिता और अधिकतम राजस्व सुनिश्चित करना है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, जिन क्षेत्रों में आवेदन नहीं आए हैं, वहां संभावनाओं को देखते हुए प्रक्रिया को पुनर्गठित किया जा रहा है।
वित्तीय वर्ष 2026-27 और 2027-28 के मद्देनजर सरकार की नजर राजस्व बढ़ोतरी पर टिकी है। ऐसे में राजधानी की प्रमुख लोकेशनों पर स्थित दुकानों का आवंटन अहम माना जा रहा है। आबकारी महकमा इस पूरी प्रक्रिया पर विशेष निगरानी रखे हुए है ताकि तय समयसीमा के भीतर आवंटन पूर्ण हो और राज्य के खजाने को अपेक्षित लाभ मिल सके।