तो अब चुगलखोर तय करेंगे पत्रकारिता के नियम….? खबरो से दूर फर्जीवाड़ा करके खुद को बता रहे पत्रकार..

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राज्य में पत्रकारिता की आड़ में चल रहे कथित दबाव तंत्र को लेकर इन दिनों गंभीर चर्चाएं तेज हो गई हैं। खुद को “बड़ा पत्रकार” बताकर अधिकारियों पर रौब झाड़ना, सिस्टम के भीतर डर का माहौल बनाना और मनमानी वसूली करना—यह सब अब कुछ कथित ग्रुप संचालित करने वाले लोगों की पहचान बनता जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि जिन लोगों को पत्रकारिता की ए बी सी डी तक का ज्ञान नहीं है, वे खुद को पत्रकारिता का ठेकेदार समझ बैठे हैं और दूसरों की कार्यशैली व नीयत पर सवाल उठाना अपनी प्राथमिकता बना चुके हैं।
सूत्रों की मानें तो ये कथित पत्रकार अलग–अलग सोशल मीडिया ग्रुपों के जरिए एक संगठित दबाव तंत्र खड़ा किए हुए हैं। ग्रुपों में भेजे जाने वाले संदेशों का लहजा ऐसा होता है मानो सरकार सिर्फ इन्हीं की चुगलखोरी करने से चल रही हो । अधिकारी यदि इनके हिसाब से नहीं चलते, तो उनके खिलाफ अफवाहें, आधी–अधूरी खबरें और चरित्रहनन की कोशिशें शुरू कर दी जाती हैं। कई मामलों में यह दबाव इतना बढ़ जाता है कि ईमानदार और मेहनती अधिकारी भी मानसिक तनाव में आ जाते हैं।
चर्चा यह भी है कि ये कथित पत्रकार कभी खुद को सिस्टम के “मजबूत अधिकारियों” का सिपहसालार बताकर नीचे के अधिकारियों पर धौंस जमाते हैं। नाम लेकर या बिना नाम लिए यह जताया जाता है कि उनके पीछे सत्ता और बड़े अफसर खड़े हैं। इसी डर का फायदा उठाकर मनचाही रकम वसूलने के आरोप भी सामने आ रहे हैं। आमजन से लेकर विभागीय गलियारों तक, हर जगह इन गतिविधियों को लेकर कानाफूसी जोरों पर है।
विडंबना यह है कि पत्रकारिता का प्रमाणपत्र बांटने वाले इन लोगों के पास खुद पत्रकारिता की कोई औपचारिक डिग्री या प्रशिक्षण तक नहीं है। बावजूद इसके, ये लोग तय करने लगे हैं कि कौन सही पत्रकार है और कौन नहीं। किसी अधिकारी या संस्था द्वारा किया गया अच्छा काम भी इनके गले नहीं उतरता, क्योंकि सकारात्मक खबरें इनके कथित एजेंडे में फिट नहीं बैठतीं। नतीजतन, विकास और जनहित से जुड़े कार्य भी अनावश्यक विवादों की भेंट चढ़ जाते हैं।
जानकारों का कहना है कि इस तरह की चुगलखोर जमात न सिर्फ पत्रकारिता की साख को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को भी कमजोर कर रही है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता और सिस्टम से सवाल पूछना है, न कि निजी स्वार्थ के लिए दबाव बनाना या वसूली का जरिया बनाना। जब खबर की जगह ब्लैकमेलिंग और संवाद की जगह धमकी ले ले, तो यह पूरे पेशे के लिए खतरनाक संकेत है।
अब सवाल यह है कि सरकार और प्रशासन ऐसे तत्वों पर कब और कैसे लगाम लगाएंगे। जरूरत इस बात की है कि असली और जिम्मेदार पत्रकारिता को संरक्षण मिले, वहीं पत्रकारिता की आड़ में चल रहे दबाव और वसूली के खेल पर सख्त कार्रवाई हो। तभी उत्तराखंड में पत्रकारिता की विश्वसनीयता और गरिमा को बचाया जा सकेगा।

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