हिंदूकुश हिमालय (एचकेएच) क्षेत्र के ग्लेशियरों की स्थिति अब बेहद चिंताजनक हो गई है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) द्वारा जारी ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 30 वर्षों (1990–2020) में इस क्षेत्र के ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल लगभग 12% घट गया है, जबकि बर्फ का भंडार करीब 9% कम हो चुका है। हैरान करने वाली बात यह है कि 21वीं सदी में ग्लेशियरों के पिघलने की दर, 20वीं सदी के अंत की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई है। रिपोर्ट में कुल 63,700 से अधिक ग्लेशियरों का विश्लेषण किया गया है, जो लगभग 55,782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं। ये ग्लेशियर गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी प्रमुख नदियों के मुख्य स्रोत हैं, जो सीधे तौर पर एशिया के करीब 200 करोड़ लोगों की जल सुरक्षा से जुड़े हुए हैं।
हिंदूकुश हिमालय के 63,000 ग्लेशियरों पर मंडराया महासंकट
ICIMOD के अध्ययन में 63 हजार से अधिक ग्लेशियरों का विश्लेषण किया गया, गंभीर विषय यह है कि साल 2010 के बाद से ग्लेशियरों के सिकुड़ने की गति में हैरतंगेज इजाफा हुआ है खासकर पूर्वी और मध्य हिमालय में। जबकि अन्य छोटे ग्लेशियर सीधे प्रभावित हुए हैं या तो कई जगहों से टूट कर अलग-अलग हिस्सों में बंट गए या पूरी तरह खत्म हो गए। ICIMOD की रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया है कि साल 1975 से अध्ययन वर्ष तक बर्फ की मोटाई में भी 27 मीटर की कमी दर्ज की जा चुकी है। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि बर्फ की मोटाई घट रही है, यानी ग्लेशियरों की सेहत पतली होती जा रही है। क्षेत्रीय स्तर पर भी जहां एक ओर काराकोरम क्षेत्र में अपेक्षाकृत स्थिरता रही, तो वहीं गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई। इन इलाकों के ग्लेशियर क्षेत्र में लगभग 21 और 16 प्रतिशत की कमी आई।
ग्लेशियर पिघलने से बढ़ रहे खतरे
आईसीमोड (ICIMOD) की ताज़ा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने से प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। ग्लेशियरल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी घटनाएं अब अधिक बार और अधिक विनाशकारी रूप से हो रही हैं। हाल के वर्षों में सिक्किम और उत्तराखंड में आई भीषण आपदाएं इसी बदलते परिदृश्य की ओर इशारा करती हैं, जहां अचानक बाढ़ और मलबे ने सैकड़ों जानें ले लीं और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस संकट के पीछे मुख्य कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि और वर्षा के पैटर्न में हो रहा बदलाव है। रिपोर्ट के अनुसार, 5500 मीटर से नीचे स्थित ग्लेशियर सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं, जबकि ऊंचाई वाले ग्लेशियर अपेक्षाकृत धीमी गति से पिघल रहे हैं। इसके अलावा, दक्षिण और पूर्व दिशा की ओर मुख वाले ग्लेशियर सूर्य की अधिक सीधी किरणें पड़ने के कारण तेज़ी से क्षरण का शिकार हो रहे हैं।
रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि यदि जलवायु परिवर्तन की वर्तमान गति नहीं रुकी, तो आने वाले दशकों में इन आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में और भी इजाफा होगा, जिससे न केवल पर्वतीय क्षेत्रों बल्कि मैदानी इलाकों के करोड़ों लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन की वर्तमान गति नहीं रुकी, तो सदी के अंत तक हिंदूकुश हिमालय के 70 से 80% ग्लेशियर पूरी तरह खत्म हो सकते हैं। इससे न केवल बाढ़, सूखा और भूस्खलन जैसी आपदाओं में इजाफा होगा, बल्कि कृषि, पेयजल और ऊर्जा उत्पादन पर भी गहरा संकट मंडराएगा। रिपोर्ट को ‘थर्ड पोल’ कहलाने वाले इस क्षेत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी माना जा रहा है।

