उत्तराखंड के 9 जिलों में खेती-किसानी कगार पर, CIAR की रिपोर्ट में उजागर “बड़ा संकट”

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सावधान, मौसम, जंगली जानवरों की दखलअंदाजी और उत्तराखंडियों का बदलता मिजाज तीनों धरती मां के लिए परेशानी का सबब बन चुके हैं। जी हां यकीन मानिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने देश भर के 201 जिलों में खेती-बाड़ी को लेकर एक अध्ययन किया। जिसमें पता चला है कि उत्तराखंड के 9 जिले ऐसे हैं जहां खेती किसानी बीते कल की बात हो जाएगी। उसकी वजह है मौसम का बदलता मिज़ाज सरकारों की नजरअंदाजी और वहां की आबादी की बदलती सोच के साथ जंगली जानवरों की अपनी सरहदों को लांघकर इंसानी आबादी में निवाला तलाशना ।

दरअसल पहाड़ी जिलों में रहने वाले वाशिंदों की बदलती सोच ने उसे मैदान की ओर धकेल दिया है। जहां वो किराए के फ्लैट या सौ दो सौ गज के मकान में सहूलियतों के साथ जीना पसंद करता हैं। अब पहाड़ों के अपने गांवों में उन्हें खेती-किसानी करना पसंद नहीं है। कोई करना भी चाहे तो बदलते दौर में उसके लिए खेती करना अग्निपरीक्षा से कम भी नहीं। जंगली जानवर उसे घर के आंगन से लेकर खेत तक चुनौती दे रहे हैं। तो लगातार सूखते जलस्रोत उसके माथे पर शिकन उभार रहे हैं।
बहरहाल अच्छी तालीम और बेहतर चिकित्सा सुविधा की हसरत ने उन्हें अब उत्पादक से उपभोक्ता बना कर रख दिया है। वहीं मौसम के बदलते मिज़ाज और बढ़ते तापमान ने रही सही कसर पूरी कर दी है। जिसका खामियाजा पहाड़ की धरती भोग रही है। गांव खाली है और खेत-खलिहान बंजर।

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गौरतलब है कि राज्य गठन के समय यहां खेती का रकबा 7.70 लाख हेक्टेयर था लेकिन अब इसमें 2.43 लाख हेक्टेयर की कमी आई है। इसमें भी 2.08 लाख हेक्टेयर परती भूमि है। सिंचाई की बात करें तो कुल सिंचित क्षेत्रफल 3.01 लाख हेक्टेयर है। इसमें मैदानी क्षेत्र में 90.61 प्रतिशत और पर्वतीय क्षेत्र में 9.39 फीसद ही सिंचित क्षेत्र है। बाकी खेती-किसानी मौसम के रहमोकरम पर निर्भर है। इन हालातों में सूबे के पहाड़ हों या मैदान हर इलाके में खेती-किसानी सिमट रही है। मैदानों में शहरों से सटे गांवों के खेतों में इंसान फसल के बजाए कंकरीट उगा रहा है।

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बहरहाल आईसीएआर की अध्ययन में यह बात सामने आई है। ये रिपोर्ट चेतावनी दे रही है कि अगर वाजिब कसरत न की गई तो सूबे के नौ जिलों में खेती की संभावना ही खत्म हो जाएगी। नेशनल इनोवेशन इन क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर के तहत देश के 201 जिलों में कराये गए अध्ययन के रिपोर्टकार्ड खेती के लिए खतरे की घंटी बजाई है। इसमें 109 जिलों को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है, उनमें उत्तराखंड के नौ जिले शामिल हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि हालात कितने संजीदा है। राज्य के रुद्रप्रयाग, टिहरी, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, चंपावत, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिले को रिपोर्ट में अत्यधिक जोखिम श्रेणी में रखा गया है, जबकि पौड़ी और चमोली जिलों को उच्च जोखिम श्रेणी में रखा गया है।

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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की रिपोर्ट के मुताबिक मौसम के बदलते मिजाज ने इन जिलों के खेतों से नमी चुरा ली है। कभी बेहिसाब बारिश तो कभी नाममात्र बारिश कभी बर्फबारी तो कभी बिना बर्फ के ही सर्दियों का गुजर जाना, तो वहीं हर साल जंगलों का आग की चपेट में आने के चलते कुदरती जलस्रोत सूख रहे हैं। जिन गाड-गधेरों में पूरे साल पानी रहता था अब उनसे पानी बरसात सिमटने के साथ ही खत्म हो रहा है। बहरहाल सूबे में खेती के लिए जरूरी सिंचाई के साधन लकवाग्रस्त हो गए हैं। लिहाजा जरूरी है बड़ा कदम उठाने की ताकि गांवों में जल-जंगल और खेत-खलिहान फिर से हरे भरे हो सकें और मैदानो का उपभोक्ता फिर से पहाड़ों में उत्पादक हो सके।

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