राज्य में बेरोजगारी अब सिर्फ चिंता का विषय नहीं रही, बल्कि कुछ लोगों के लिए “कमाई का स्थायी साधन” बन चुकी है। ताजा मामला स्वास्थ्य विभाग में लैब टेक्नीशियन के पद सृजन के नाम पर सामने आया है, जहां नौकरी दिलाने के सपने दिखाकर लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये जुटाए जाने की चर्चाएं जोरों पर हैं। बताया जा रहा है कि करीब छह माह पहले लैब टेक्नीशियन के लगभग 1000 पद सृजित होने की चर्चा ने बेरोजगार युवाओं में नई उम्मीद जगा दी थी। डिग्रीधारी युवा, जो वर्षों से नौकरी की तलाश में भटक रहे थे, इस मौके को अपनी जिंदगी बदलने का अवसर मान बैठे। लेकिन यह “मौका” कब “मौकापरस्ती” में बदल गया, इसका अंदाजा किसी को नहीं लगा।
सूत्रों के मुताबिक, नौकरी दिलाने के नाम पर प्रति अभ्यर्थी से मोटी रकम वसूली गई। रकम इतनी बड़ी थी कि कुल मिलाकर यह आंकड़ा करोड़ों तक पहुंच गया। किसी ने कर्ज लेकर पैसा दिया, तो किसी ने अपने घर के गहने बेचकर। भरोसा सिर्फ इतना था कि “सेटिंग” पक्की है और नौकरी मिलना तय है।
लेकिन छह महीने बाद अचानक इस पूरी प्रक्रिया पर ब्रेक लग गया। न कोई भर्ती निकली, न कोई आधिकारिक सूचना आई—और न ही अब तक किसी को नौकरी मिली। इससे भी बड़ी बात यह कि जिन लोगों ने पैसे दिए, उन्हें अब पैसा वापस मिलने की उम्मीद भी नजर नहीं आ रही। मामला जब गरमाया तो जिम्मेदारों ने एक-एक कर किनारा करना शुरू कर दिया। “साहब” से लेकर “मेम साहब” तक ने इस पूरे मामले से दूरी बना ली। जब कुछ पीड़ितों ने मेम साहब तक अपनी बात पहुंचाई, तो जवाब मिला—“जिसे पैसा दिया है, उसी से बात करो, हमारे पास कोई पैसा नहीं आया।”
यानी जिनके नाम पर पैसा लिया गया, वही अब खुद को पूरी तरह अलग बता रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर ये करोड़ों रुपये गए कहां?
सूत्र बताते हैं कि इस पूरे खेल में दो किरदार खास तौर पर चर्चा में हैं—एक निजी अस्पताल में कार्यरत व्यक्ति और दूसरा स्वास्थ्य विभाग में संविदा पर तैनात कर्मचारी। दोनों पर आरोप है कि इन्होंने ही बेरोजगार युवाओं को जाल में फंसाकर यह पूरा नेटवर्क खड़ा किया। मामला अब इतना बढ़ चुका है कि कुछ दिन पहले स्वास्थ्य विभाग के एक बड़े कार्यालय में इसे लेकर जमकर कहासुनी और भिड़ंत भी हुई। पीड़ितों का गुस्सा अब खुलकर सामने आने लगा है और वे अपने पैसे वापस लेने के लिए दबाव बना रहे हैं। अब “डिग्री” नहीं, “डील” ही नौकरी का रास्ता बनती जा रही है—और जब डील फेल हो जाए, तो पूरा सिस्टम ही हाथ खड़े कर देता है। अगर इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होती है, तो बड़े खुलासे होने तय हैं। साथ ही, बेरोजगार युवाओं के सपनों से खिलवाड़ करने वाले कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं। लेकिन सवाल यही है—क्या सिस्टम जागेगा !

