देहरादून। उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग में फैले व्यापक भ्रष्टाचार की गूंज अब केवल दबी-ढकी बातें नहीं रह गई, बल्कि इसके ठोस सबूत भी धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और सरकार द्वारा घोषित जीरो टॉलरेंस की नीति पर सीधे सवाल खड़े हो रहे हैं।
खरीद-फरोख्त पर गहराया विवाद
दरअसल, स्वास्थ्य विभाग में हर साल करोड़ों रुपए का बजट उपकरणों और मशीनों की खरीद पर खर्च होता है। इस खरीद-फरोख्त की कमान विभाग के संयुक्त निदेशक (स्टोर) के हाथों में होती है। आरोप है कि मौजूदा संयुक्त निदेशक (जेडी स्टोर) डॉ. आनंद शुक्ला ने अपने पसंदीदा ठेकेदारों का एक ‘लॉबी ग्रुप’ तैयार कर रखा है, जिसके माध्यम से करोड़ों रुपए के टेंडर इन्हीं को दिए जा रहे हैं।
ताजा विवाद तब गहराया, जब एक वायरल फोटो सामने आई, जिसमें डॉ. शुक्ला कथित तौर पर देर रात महखाने में बैठे दो ठेकेदारों के साथ दिखाई दिए। यही दोनों ठेकेदार विभाग की महंगी खरीद के ठेके पाने वाले माने जाते हैं। कहा जा रहा है कि इन्हें पहले ही करोड़ों रुपए की POCT मशीनें, लैब-इन-बैग, वेंटिलेटर जैसी मशीनें सप्लाई करने का मौका मिल चुका है और अब इन्हीं के जरिए करोड़ों रूपये की सीटी स्कैन मशीन की खरीद का रास्ता भी साफ किया जा रहा है।
जेडी स्टोर की सफाई
मामले पर सफाई देते हुए डॉ. आनंद शुक्ला ने दावा किया कि वे महखाने में नींबू पानी पी रहे थे लेकिन वायरल तस्वीर साफ बयान करती है कि देर रात तक ठेकेदारों के साथ गुप्त बैठकें किस उद्देश्य से की जा रही थीं। सवाल यह है कि अगर सिस्टम में पारदर्शिता होती तो विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ठेकेदारों के साथ ऑफिस छोड़ कर महखाने में बैठकें क्यों कर रहे हैं?
जांच के आदेश, लेकिन कार्रवाई ठप
भ्रष्टाचार के मामले की शिकायत सीधे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक पहुंच चुकी है। मुख्यमंत्री ने संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश भी दिए। मगर हैरानी की बात यह है कि महीने भर बीत जाने के बाद भी जांच आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही। न तो किसी अधिकारी से पूछताछ हुई और न ही किसी ठेकेदार पर शिकंजा कसा गया। यही कारण है कि विभागीय स्तर पर इसे या तो वर्चस्व की राजनीति कहा जा रहा है या फिर पहुंच और राजनीतिक कमजोरी का नतीजा।
भ्रष्टाचार की जड़ में ठेकेदार-नेता गठजोड़?
सूत्र बताते हैं कि स्वास्थ्य विभाग में उपकरणों की खरीद केवल तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि ठेकेदारों और अफसरों की आपसी जुगलबंदी पर तय होती है। जिस ठेकेदार की ‘सिफारिश’ ऊपर तक होती है, वही टेंडर जीत जाता है। यही वजह है कि बाजार में उपलब्ध सस्ती और बेहतर मशीनें अक्सर उपेक्षित रह जाती हैं, जबकि महंगे दामों पर घटिया गुणवत्ता की मशीनें खरीदी जाती हैं।
जनता के पैसों से खेल
मामले की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि स्वास्थ्य विभाग का वार्षिक बजट हजारों करोड़ रुपए का है। यदि उसका बड़ा हिस्सा महंगे उपकरणों के नाम पर कुछ ठेकेदारों की जेब में चला जाता है, तो इसका सीधा असर जनता को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं पर पड़ता है। नतीजतन, ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल मशीनों और संसाधनों के अभाव में जूझते रहते हैं, जबकि करोड़ों की मशीनें शहरी अस्पतालों में धूल खाती रहती हैं।
सरकार की साख पर असर
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बार-बार जीरो टॉलरेंस ऑन करप्शन की बात कहते हैं। मगर स्वास्थ्य विभाग जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भ्रष्टाचार की परतें खुलने से सरकार की साख पर सीधा असर पड़ रहा है। खासकर तब, जब मुख्यमंत्री स्वयं जांच के आदेश दे चुके हों, और इसके बावजूद मुलाजिमों को ना हटाया गया और ना ही कोई कार्रवाई की गई। इतना ही नहीं स्टोर में इतना सब होने के बावजूद भी खरीदारी के तेजी दिखाई दे रही है।
निष्कर्ष
अब सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री की सख्ती महज भाषणों तक ही सीमित है या वास्तव में विभागीय स्तर पर कार्रवाई भी होगी? यदि ठेकेदार-अफसर गठजोड़ पर नकेल नहीं कसी गई, तो आने वाले दिनों में स्वास्थ्य विभाग का बजट जनसेवा के बजाय भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता रहेगा।
