उत्तराखंड में बच्चों के लापता होने के मामले लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। साल 2024 से 2026 के बीच राज्य से सैकड़ों बच्चे गायब हुए हैं। सरकारी आंकड़े और मीडिया रिपोर्ट यह साफ़ संकेत दे रहे हैं कि हालात गंभीर हैं और समय रहते ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है।
2024–25 में हर दिन औसतन 3 बच्चे लापता
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2023–24 में उत्तराखंड से कुल 1,209 बच्चे लापता हुए। इनमें लगभग 408 लड़के और 802 लड़कियां शामिल थीं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इस दौरान पुलिस केवल 276 बच्चों को ही परिवार से मिलवा पाई, जबकि 900 से अधिक बच्चे अब भी लापता बताए गए। इसका मतलब है कि राज्य में हर दिन औसतन तीन बच्चे गायब हो रहे हैं।
2025 में भी नहीं थमी घटनाएं
साल 2025 में भी बच्चों के गायब होने के मामले सामने आते रहे। देहरादून जिले में ही सिर्फ दो महीनों के भीतर 97 नाबालिगों के लापता होने की शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें से 87 बच्चों को पुलिस ने खोज लिया, जबकि कुछ मामले अभी भी लंबित हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि समस्या लगातार बनी हुई है, भले ही कुछ बच्चों की बरामदगी हो रही हो।
2026 का पूरा डेटा अभी प्राप्त नहीं
एनसीआरबी की रिपोर्ट आमतौर पर वार्षिक रूप से जारी होती है। इसी वजह से साल 2025–26 का पूर्ण और आधिकारिक आंकड़ा अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन शुरुआती संकेत बताते हैं कि चुनौती अब भी गंभीर बनी हुई है।
बच्चों के गायब होने के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों और पुलिस जांच में सामने आए कारणों में शामिल हैं:
- घर से भागना
परिवारिक कलह, पढ़ाई का दबाव, सोशल मीडिया का प्रभाव और माता-पिता से संवाद की कमी के चलते कई बच्चे घर छोड़ देते हैं। - मानव तस्करी और अपहरण
कुछ मामलों में बच्चों के तस्करी नेटवर्क या अपहरण से जुड़े होने की आशंका भी जताई गई है, खासकर सीमावर्ती और शहरी इलाकों में। - गरीबी और सामाजिक दबाव
गरीबी, बेरोज़गारी, असुरक्षित माहौल और शिक्षा की कमी बच्चों को गलत राह पर धकेल सकती है। - प्राकृतिक आपदाएं
उत्तराखंड में बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाओं में भी कई बार लोग, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, लापता हो जाते हैं।
पुलिस और सरकार की पहल
उत्तराखंड पुलिस द्वारा “ऑपरेशन स्माइल” जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं, जिनके तहत कई लापता बच्चों को सुरक्षित बरामद कर परिवारों से मिलाया गया है। इसके साथ ही हेल्पलाइन नंबर, NGO सहयोग और जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ अभियान नहीं, बल्कि मजबूत निगरानी तंत्र और सामाजिक जागरूकता की भी ज़रूरत है।
क्यों जरूरी है गंभीर कदम?
बच्चों का लापता होना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की टूटती उम्मीदों और भविष्य की सुरक्षा का सवाल है। समाज, प्रशासन और सरकार — तीनों को मिलकर इस दिशा में ठोस रणनीति बनानी होगी। बहरहाल, उत्तराखंड में लापता बच्चों का मुद्दा एक गंभीर सामाजिक संकट बनता जा रहा है। जब तक हर बच्चा सुरक्षित नहीं, तब तक यह सवाल बना रहेगा —आख़िर हमारे बच्चे कहां जा रहे हैं?


