पीपीपी मॉडल में ‘मशीनों का खेल’: पौड़ी अस्पताल में नई CT स्कैन बनी मुसीबत, पुरानी मशीन ने फंसाया पूरा सिस्टम सीएमओ सस्पेंड….

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देहरादून:
उत्तराखंड में पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मोड पर संचालित अस्पतालों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये खर्च कर खरीदी गई मशीनें अब खुद ही सिस्टम के लिए सिरदर्द बनती नजर आ रही हैं। ताजा मामला पौड़ी जिला अस्पताल का है, जहां 64 स्लाइस की नई सीटी स्कैन मशीन की स्थापना के बाद पुरानी मशीन को लेकर उठा विवाद पूरे स्वास्थ्य महकमे के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन गया है।
दरअसल, जिला अस्पताल पौड़ी में वर्ष 2013 में स्थापित की गई सीटी स्कैन मशीन समय के साथ पुरानी हो चुकी थी। इसके बाद वर्ष 2022 में अस्पताल में आधुनिक तकनीक से लैस 64 स्लाइस की नई सीटी स्कैन मशीन लगाई गई, जिससे मरीजों को बेहतर जांच सुविधा मिलने की उम्मीद थी। लेकिन मशीन की स्थापना की प्रक्रिया ही अब सवालों के घेरे में आ गई है। सूत्रों के अनुसार, जब नई मशीन स्थापित की जा रही थी, उस समय पुरानी मशीन को हटाने की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। यही लापरवाही अब विवाद की जड़ बन गई है। बताया जा रहा है कि जिला अस्पताल प्रशासन ने वर्ष 2022 में ही स्वास्थ्य महानिदेशालय को पत्र लिखकर पुरानी मशीन से जुड़े मुद्दों की जानकारी दी थी। इसमें उल्लेख किया गया था कि पुरानी मशीन की निर्माता कंपनी को करीब 23 लाख रुपये एएमसी (वार्षिक रखरखाव) के रूप में देने थे, जबकि मशीन को हटाने या शिफ्ट करने में करीब 5 लाख रुपये का अतिरिक्त खर्च आना था।
हालांकि, इस संबंध में विभाग की ओर से कोई ठोस या सकारात्मक पहल नहीं की गई। नतीजतन, बिना पुरानी मशीन को हटाए ही नई मशीन को स्थापित कर दिया गया। यही निर्णय अब पूरे मामले में जांच और कार्रवाई का कारण बन गया है। बताया जा रहा है कि
मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तर से एक जांच टीम पौड़ी भेजी गई थी। टीम ने अस्पताल पहुंचकर पुरानी मशीन का निरीक्षण किया और उसकी स्थिति का आकलन करते हुए विस्तृत रिपोर्ट उच्च स्तर को सौंप दी। रिपोर्ट मिलते ही शासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तत्कालीन मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. प्रवीण कुमार को निलंबित कर दिया।
बताया जा रहा है कि जिस समय नई सीटी स्कैन मशीन स्थापित की गई, उस दौरान जिला अस्पताल पीपीपी मोड पर संचालित हो रहा था। ऐसे में निजी भागीदारी और सरकारी निगरानी के बीच समन्वय की कमी भी इस पूरे विवाद की एक बड़ी वजह मानी जा रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर किस स्तर पर यह चूक हुई और जिम्मेदारी तय करने में इतना समय क्यों लगा।
स्वास्थ्य विभाग के भीतर इस कार्रवाई के बाद हड़कंप मचा हुआ है। अधिकारी और कर्मचारी अब पुराने फैसलों और प्रक्रियाओं की समीक्षा में जुट गए हैं ताकि भविष्य में इस तरह की स्थिति से बचा जा सके।
फिलहाल, यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि पीपीपी मॉडल की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। करोड़ों रुपये खर्च कर लाई गई आधुनिक मशीनें अगर सही योजना और समन्वय के अभाव में विवादों में घिर जाएं, तो इसका सीधा नुकसान आम जनता को ही उठाना पड़ता है।
अब देखना होगा कि शासन इस मामले में आगे क्या कदम उठाता है और क्या जिम्मेदारों पर और सख्त कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा।