किसान सुखवंत सिंह आत्महत्या मामला, साजिश की आशंका गहराई, क्या कोई कर रहा है सरकार और जिला पुलिस के ख़िलाफ़ षड्यंत्र…..?

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उधमसिंह नगर में किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या का मामला अब धीरे-धीरे एक सामान्य घटना से आगे बढ़कर किसी सुनियोजित षड्यंत्र की ओर इशारा करता हुआ दिखाई दे रहा है। जिस तरह से इस पूरे मामले को लेकर रोज नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं, उससे न केवल सरकार की साख पर सवाल खड़े हो रहे हैं बल्कि पुलिस प्रशासन, खासकर एसएसपी को भी टारगेट किया जा रहा है। 11 तारीख से लेकर अब तक सामने आए घटनाक्रम इस बात को बल दे रहे हैं कि यह आत्महत्या किसी गहरी साजिश का हिस्सा हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल किसान सुखवंत सिंह के तथाकथित सुसाइड नोट को लेकर खड़ा हो रहा है। सूत्र बता रहे है कि यह सुसाइड नोट 5 से 6 पन्नों का है और इसे करीब 70 से अधिक एजेंसियों को भेजा गया है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक यह नोट सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। यदि कोई किसान आत्महत्या जैसा कदम उठाता है तो आमतौर पर सुसाइड नोट छोटा और भावनात्मक होता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या खेतों में मेहनत करने वाला एक किसान इतना लंबा, विस्तृत और योजनाबद्ध सुसाइड नोट लिख सकता है? यदि नहीं, तो फिर यह नोट किसने लिखा और क्यों?
इस मामले में लगातार सुखवंत सिंह के परिजनों के साथ हो रही बातचीत और उनके द्वारा जारी किए जा रहे वीडियो भी संदेह को और गहरा कर रहे हैं। इन वीडियो में जिस तरह से बातें सामने आ रही हैं, उससे यह संकेत मिल रहा है कि किसी न किसी स्तर पर इस पूरे प्रकरण को दिशा देने की कोशिश की जा रही है। यदि सुसाइड नोट वास्तव में मौजूद है और उसे जानबूझकर सामने नहीं लाया जा रहा, तो इससे सरकार को आगे चलकर और भी कठिन सवालों का सामना करना पड़ सकता है । एक बड़ा सवाल और उठ रहा है कि आखिरकार इस मामले से जुड़े पुलिस कर्मियों की एसीआर (Annual Confidential Report) किसके द्वारा लीक हुई है। किसी भी पुलिस अधिकारी या कर्मचारी की एसीआर अत्यंत गोपनीय दस्तावेज होती है। ऐसे में यह लीक कैसे हुई, किसने की और किस उद्देश्य से की—यह सब जांच का अहम विषय है। यदि इस तरह के गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक हो रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर सिस्टम की सुरक्षा और पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।
इसके अलावा, 26 दिसंबर को जब किसान सुखवंत सिंह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मिले थे, तब दी गई 8 पेज की शिकायत में पुलिस या किसी एसएसपी का नाम नहीं होना भी कई सवाल खड़े करता है। यदि वास्तव में उन्हें पुलिस द्वारा डराया या धमकाया गया था, तो उस शिकायत में इसका उल्लेख क्यों नहीं किया गया? क्या उस समय दबाव नहीं था, या फिर यह पूरा कथानक बाद में गढ़ा गया?
राजनीतिक गलियारों में भी इस मामले को लेकर चर्चाएं तेज हैं। विपक्ष जहां इसे सरकार की विफलता और किसान विरोधी नीति से जोड़ने की कोशिश कर रहा है, वहीं सत्तापक्ष इसे सरकार की छवि खराब करने की साजिश बता रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि कहीं यह पूरा मामला किसी अधिकारी की कुर्सी हिलाने या प्रशासनिक संतुलन बिगाड़ने के लिए तो नहीं रचा गया। अब यह बेहद जरूरी हो गया है कि सरकार और जांच एजेंसियां इस मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और गहन जांच करें। सुसाइड नोट को जल्द सार्वजनिक किया जाए, उसकी फॉरेंसिक जांच हो और यह स्पष्ट किया जाए कि उसे किसने लिखा। साथ ही एसीआर लीक जैसे गंभीर मुद्दों पर भी जिम्मेदारी तय की जाए। यदि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कोई षड्यंत्र है, तो उसका पर्दाफाश होना न केवल न्याय के लिए बल्कि सिस्टम पर जनता के भरोसे को बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है।

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