अब डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए रूस, चीन जैसे तमाम उन देशों में जाना बेकार है जहां डॉक्टरी की पढ़ाई उनकी भाषा में होती है। मतलब रूस में रशियन भाषा में चीन में चाईनीज,यूक्रेन में यूक्रेनी, जर्मन में जर्मनी भाषा में या इसके अलावा कुछ और देश भी हैं जहां एमबीबीएस की पढाई उनकी राष्ट्रीय भाषा में होती है। ऐसे देशों में मेडिकल की पढाई भारत के मुकाबले बेहद सस्ती है। भारत में जहां निजी मेडिकल कॉलेजों में पांच साल का खर्चा एक करोड़ से भी ऊपर पहुंच जाता है। वहीं विदेशी मुल्कों में मेडिकल की पढ़ाई लिखाई तकरीबन बीस-पच्चीस लाख में सिमट जाती है।
यही वजह है कि जिन भारतीय बच्चों की हसरत डॉक्टर बनने की होती है वे कई ऐसे मुल्कों का रुख करते हैं जहां मेडिकल की पढ़ाई उनके मम्मी पापा के बजट में आसानी से समा जाए। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि उन मुल्कों में पढाई उन्ही की भाषा में होती है। लिहाजा भारतीय बच्चों को मेडिकल की पढाई से पहले एक साल तक उस देश की लैंग्वेज लिखनी पढनी सीखनी होती है। उसके बाद ही उन्हें एमबीबीएस की तालीम हासिल करने का मौका मिलता है। लेकिन अब भारतीय बच्चों का ये ख्वाब चकनाचूर हो गया है।
दरअसल राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने नए मानक जारी कर दिए हैं। जिनके मुताबिक भारत में अब उन्ही विदेशी विश्वविद्यालयों की डिग्री मान्य होगी जहां एमबीबीएस की पढ़ाई अंग्रेजी में कराई गई होगी। लोकल लैंग्वज वाले विदेशी डिग्री धारियों को इंडिया में मान्य डॉक्टर नहीं माना जाएगा। न उन्हें नौकरी की परमीशन मिलेगी और न ही प्रैक्टिस करने की इजाजत मिलेगी। लिहाजा उनकी विदेशी मेडिकल की डिग्री लाखों खर्च करने के बाद भी इंडिया में महज कागज का टुकड़ा रह जाएगी. हालांकि विदेश से मेडिकल की डिग्री लेने के बाद भी ऐसे छात्रों को भारत में परीक्षा देनी होती है और पास होने के बाद ही डॉक्टरी की परमीशन मिलती है। लेकिन अब राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने छात्रों के लिए उन विदेशी मुल्कों के विश्वविद्यालयों के दरवाजे बंद कर दिए हैं जो चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई स्थानीय भाषा में करवाते हैं।
दरअसल राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने साफ कर दिया है कि भारत में उन्ही विदेशी विश्वविद्यालयों की डिग्री प्रैक्टिस के लिए मान्य होगी जिन्होंने मेडिकल की पढाई इंगलिश में करवाई होगी। बहरहाल एनएमसी ने कहा है कि नए नियम तय कर दिए गए हैं लिहाजा जो छात्र मेडिकल की पढाई के लिए विदेश जा रहे हैं वे इसका ख्याल जरूर रखें। उसी विश्वविद्यालय में दाखिला लें जहां मेडिकल सांइस की पढ़ाई इंगलिश में होती हो।
बहरहाल एनएमसी के नए फैसले से सबसे बड़ी दिक्कत उन छात्रों के लिए हो गई है जो विदेश में अभी लोकल लैंग्वेज में एमबीबीएस की तालीम ले रहे हैं और उनका दूसरा, तीसरा या चौथा पांचवा साल चल रहा है। क्योंकि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने साफ नहीं किया है कि ऐसे छात्रों को नीट में बैठने का मौका दिया जाएगा या नहीं। तय है कि अगर उन्हें नीट इक्जाम में बैठने का मौका नहीं मिला तो भारत में उनकी एमबीबीएस की डिग्री महज काग़ज़ का टुकड़ा रह जाएगी। लिहाजा जरूरत है उन छात्रों के बारे में सोचने की जिनका सत्र जारी है।

