उत्तराखंड में किसान की आत्महत्या, जमीन विवाद और नेताओं पर लगे आरोप इन तीन कारणों ने प्रदेश राजनीति में भूचाल ला दिया है। उधम सिंह नगर में किसान सुखवंत सिंह द्वारा आत्महत्या किए जाने, सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट किए जाने और सुसाइड नोट के प्राप्त होने से पुलिस प्रशासन और सत्ताधारी नेताओं की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। सवाल हैं कि क्या यह मुद्दा वाकई में जनहित से जुड़ा है या फिर यह एक सियासी हथियार के तौर पर उपयोग किया जा रहा है ? क्या उत्तराखंड में अपराध मात्र तब चर्चा और आक्रोष का विषय बनता है जब उससे कोई सियासी फायदा जुड़ा हो या फिर कुछ ही मामलों को हवा देकर शेष घटनाओं को जानते-बूझते हासिए पर ढकेल दिया जाता है ?
पक्ष-विपक्ष के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप
वहीं विपक्षी दल कांग्रेस का कहना है कि यह मुद्दा मात्र सत्ता का दुरुपयोग और प्रशासनिक गठजोड़ का परिणाम है, इस क्रम में कांग्रेस वरिष्ठ प्रदेश उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना का आरोप है कि उत्तराखंड में सत्ताधारी दल के संरक्षण में किसानों का उत्पीड़न हो रहा है। उनका कहना है कि डर के माहौल की वजह से लोग खुलकर सामने नहीं आ पा रहे, लेकिन हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि अब लोग बोलने को मजबूर हो रहे हैं।
हालांकि, सत्तादल भाजपा इसे आरोपों की राजनीति करार दे रहा है, इस कड़ी में भाजपा प्रदेश प्रवक्ता कमलेश रमन का कहना है कि आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और सरकार ज़मीन विवादों को लेकर गंभीर है। सरकार के मुताबिक, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर मामलों के निस्तारण के लिए कमेटी गठित की गई है और अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि ऐसे मामलों को समयबद्ध तरीके से सुलझाया जाए।
मुद्दा एक-सवाल अनेक
वहीं इस मुद्दे को लेकर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक कुलदीप राणा एक अलग नजरिया पेश करते हैं, उनका कहना है कि उत्तराखंड में ज़मीन और रियल एस्टेट का मुद्दा नया नहीं है बल्कि यह लंबे समय से व्हाइट कॉलर क्राइम का माध्यम बनता रहा है। राजनीतिक विश्लेषक राणा ने सवाल उठाया कि क्या प्रदेश में हर अपराध को समान महत्व मिलता है या फिर सियासत में वही मामले हिलोरे लेते हैं जिनस कोई न कोई सियासी हित जुड़ा हो ? क्योंकि अक्सर कई घटनाएं बिना चर्चा के दब जाती हैं, क्योंकि उनसे कोई सियासी फायदा नहीं जुड़ा होता।
बहरहाल, उत्तराखंड में ज़मीन, अपराध और राजनीति की रेखाएं अब धुंधली होती जा रही हैं। अब सवाल केवल यह नहीं है कि मुख्य दोषी कौन है बल्कि सवाल यह है कि क्या हर अपराध को बराबर न्याय और ध्यान मिलता है, या फिर वही मुद्दे प्रकाश में लाए जाते हैं जिनसे सत्ता कि कुर्सी हिलती या मजबूत होती हो! हालांकि, यह लड़ाई इंसाफ की है या सियासी फायदे की यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन इतना तय है कि बदलते उत्तराखंड में प्रश्नचिह्मों का अंबार लग चुका है।


