“दल बदलो, दल बदलाओ—कांग्रेस में आकर सब पवित्र बन जाओ!”

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देहरादून। चुनावी साल की दस्तक के साथ ही उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर “आया राम–गया राम” का पुराना अध्याय तेज़ी से खुलता नजर आ रहा है। राजनीतिक दलों के सदस्यता अभियान अब विचारधारा से ज्यादा “वेलकम काउंटर” बनते दिख रहे हैं, जहां कल तक विरोध में खड़े नेता आज गले मिलते दिखाई दे रहे हैं। खासकर कांग्रेस की रणनीति इस बार सवालों के घेरे में है, जिस पर खुद उसके पुराने बयान ही भारी पड़ते दिख रहे हैं।
दरअसल, कांग्रेस लंबे समय से भाजपा पर यह तंज कसती रही है कि उसने अपने मंत्रिमंडल और संगठन में “कांग्रेस पृष्ठभूमि” के नेताओं को तवज्जो दी है। लेकिन अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि कांग्रेस खुद उन्हीं चेहरों के लिए दरवाजे खोलती दिख रही है, जो कभी भाजपा में विवादित रहे या किनारे कर दिए गए। ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है—क्या कांग्रेस का “परिवार बढ़ाओ अभियान” अब “जो मिले, उसे अपनाओ अभियान” बनता जा रहा है?
चुनावी माहौल में नेताओं का दल बदलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार इसकी रफ्तार और पैटर्न दोनों ही दिलचस्प हैं। कोई नेता “घर वापसी” का नाम देकर वापसी कर रहा है, तो कोई “सम्मान की तलाश” में नया ठिकाना खोज रहा है। मगर असलियत यही है कि टिकट की उम्मीद और राजनीतिक भविष्य की सुरक्षा ही इस खेल का असली आधार बनती दिख रही है।
कांग्रेस की मौजूदा रणनीति पर नजर डालें तो साफ लगता है कि पार्टी अपने संगठन को मजबूत करने के लिए संख्या बल बढ़ाने पर ज्यादा जोर दे रही है। लेकिन इस जल्दबाज़ी में पार्टी यह भूलती नजर आ रही है कि जिन चेहरों को वह शामिल कर रही है, वे अपने साथ विवादों का लंबा इतिहास भी लेकर आते हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या ये नेता कांग्रेस की छवि को मजबूत करेंगे या फिर अंदरूनी कलह को और हवा देंगे?
भाजपा पर “दलबदलुओं की पार्टी” होने का आरोप लगाने वाली कांग्रेस अब खुद उसी राह पर चलती दिखाई दे रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जो आरोप लगाए जाते थे, अब वही परिस्थितियां खुद कांग्रेस के दरवाजे पर खड़ी हैं। यह स्थिति कहीं न कहीं पार्टी की “कथनी और करनी” के अंतर को उजागर करती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी समय में इस तरह की जोड़-तोड़ अल्पकालिक लाभ तो दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में संगठन की विचारधारा और विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाती है। खासकर तब, जब पार्टी अपने ही पुराने बयानों के उलट कदम उठाती नजर आए।
अब देखने वाली बात यह होगी कि भाजपा से आए ये नए चेहरे कांग्रेस में क्या गुल खिलाते हैं और पार्टी इन्हें किस तरह साध पाती है। लेकिन फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि उत्तराखंड की राजनीति में “दल बदल” अब अपवाद नहीं, बल्कि परंपरा बन चुका है—जहां सिद्धांत पीछे छूट जाते हैं और सत्ता की राजनीति आगे निकल जाती है।