उत्तराखंड विधानसभा के पटल पर रखी गई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में कोविड-19 काल के दौरान स्वास्थ्य विभाग में हुई खरीदारी एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। रिपोर्ट में जहां महंगी दरों पर एंबुलेंस और उपकरण खरीदने का मामला सामने आया है, वहीं अब इससे भी बड़ा और गंभीर पहलू सामने आ रहा है। सूत्रों के अनुसार कोविड काल की कई महत्वपूर्ण खरीद फाइलें आज भी विभाग के पास उपलब्ध नहीं हैं और बताया जा रहा है कि वे फाइलें एक ऐसे अधिकारी के पास हैं जो सेवानिवृत्त होने के बाद भी सरकारी सेवाओं से जुड़ा हुआ है। सूत्रों का कहना है कि कोविड महामारी के दौरान स्वास्थ्य विभाग में उपकरणों, एंबुलेंस और अन्य संसाधनों की खरीद से जुड़ी तमाम फाइलें उस समय एक वरिष्ठ अधिकारी के पास थीं। हैरानी की बात यह है कि विभागीय रिकॉर्ड में वे फाइलें आज भी उपलब्ध नहीं हैं। कई बार सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत इन फाइलों से जुड़ी जानकारी मांगी गई, लेकिन हर बार विभाग की ओर से यही जवाब दिया गया कि संबंधित फाइलें उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए सूचना प्रदान नहीं की जा सकती।
बताया जा रहा है कि कोविड खरीद से जुड़ी ये फाइलें यदि पूरी तरह सामने आ जाएं तो कई और बड़े खुलासे संभव हैं। यही वजह है कि इन फाइलों के गायब होने या विभाग को वापस न मिलने को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सूत्रों के अनुसार स्वास्थ्य विभाग के पूर्व उच्चाधिकारियों ने भी कई बार संबंधित अधिकारी को पत्र लिखकर फाइलें विभाग को वापस उपलब्ध कराने के लिए कहा था। इतना ही नहीं, यह मामला राज्य सूचना आयोग तक भी पहुंच चुका है, लेकिन इसके बावजूद फाइलें आज तक विभाग के रिकॉर्ड में वापस नहीं आई हैं।
इधर, विधानसभा में प्रस्तुत कैग रिपोर्ट ने कोविड काल की खरीद प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग ने एंबुलेंस खरीद के दौरान किफायती दरों के प्रस्ताव को नजरअंदाज करते हुए अधिक कीमत वाले प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इसके कारण सरकारी खजाने को करीब 87 लाख रुपये का अतिरिक्त नुकसान हुआ। कैग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि एंबुलेंस खरीद के लिए अपनाई गई टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी और उसमें पक्षपात की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
कैग रिपोर्ट के अनुसार कोविड काल में स्वास्थ्य विभाग ने करीब 36 करोड़ रुपये की लागत से कुल 140 एंबुलेंस खरीदी थीं। महामारी के समय तत्काल व्यवस्था की आवश्यकता का हवाला देते हुए यह खरीद प्रक्रिया तेज गति से की गई थी, लेकिन अब सामने आ रहे तथ्यों से स्पष्ट हो रहा है कि उस दौरान नियमों और वित्तीय अनुशासन का पालन पूरी तरह नहीं किया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कैग जैसी संवैधानिक संस्था किसी विभाग की जांच करती है तो उसे सभी जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराए जाने चाहिए। ऐसे में यदि कोविड खरीद से जुड़ी पूरी फाइलें कैग तक नहीं पहुंचीं है, तो यह अपने आप में गंभीर मामला हो सकता है। सूत्रों का कहना है कि यदि वे फाइलें जांच एजेंसियों या कैग के हाथ लग जातीं तो कई और अनियमितताओं का खुलासा हो सकता था।
वर्तमान में यह मामला एक बार फिर चर्चा में है और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। विभाग के भीतर भी इस बात को लेकर चिंता जताई जा रही है कि आखिर कोविड काल जैसी संवेदनशील अवधि की महत्वपूर्ण फाइलें आज तक विभागीय रिकॉर्ड में क्यों नहीं हैं। यदि इन फाइलों का पता नहीं चलता है तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि करोड़ों रुपये के संभावित घोटाले की ओर भी इशारा कर सकता है।
ऐसे में अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और जांच एजेंसियां इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से लेती हैं और क्या कोविड काल की खरीद से जुड़ी गायब फाइलों का सच सामने आ पाएगा या नहीं।

