व्हाट्सएप दरबार में अफसरशाही: आदेश ऊपर से, हाजिरी ग्रुप में!

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प्रदेशभर में इन दिनों कुछ कथित सोशल मीडिया ग्रुपों को लेकर प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। खासतौर पर व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म पर सक्रिय ऐसे ग्रुप, जिनमें खुद को “खबरनवीस” बताने वाले लोग जुड़े हैं, अब अधिकारियों पर दबाव बनाने का माध्यम बनते नजर आ रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, इन ग्रुपों में जुड़े कुछ लोग नियमित रूप से अधिकारियों की कार्यशैली पर टिप्पणियां करते हैं और कई बार इशारों इशारों में उन पर आरोप भी लगाते हैं। इतना ही नहीं, इन मंचों पर “ईमानदार” और “भ्रष्ट” अधिकारियों की ऐसी चर्चाएं हैं, मानो किसी प्रकार का अनौपचारिक सर्टिफिकेट बांटा जा रहा हो। यह प्रवृत्ति न केवल प्रशासनिक मर्यादाओं के खिलाफ मानी जा रही है, बल्कि इससे अधिकारियों के कामकाज पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
दिलचस्प बात यह है कि उच्च स्तर से कई बार अधिकारियों को ऐसे अनौपचारिक और संदिग्ध सोशल मीडिया ग्रुपों से दूरी बनाए रखने की स्पष्ट हिदायत दी जा चुकी है। शासन स्तर पर यह चिंता भी जताई गई है कि इस तरह के ग्रुप न केवल भ्रामक जानकारी फैलाने का माध्यम बन सकते हैं, बल्कि इनका इस्तेमाल व्यक्तिगत या समूह विशेष के हित साधने के लिए भी किया जा सकता है।
इसके बावजूद, कई अधिकारी अब भी इन ग्रुपों में सक्रिय बने हुए हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर स्पष्ट निर्देशों के बाद भी अधिकारी इन प्लेटफॉर्म्स को छोड़ने से क्यों कतरा रहे हैं? क्या यह केवल जिज्ञासा या सूचना पाने की इच्छा है, या फिर इसके पीछे कोई दबाव या मजबूरी भी काम कर रही है?
प्रशासनिक सूत्रों का मानना है कि कुछ मामलों में अधिकारी इस डर से भी ग्रुप नहीं छोड़ते कि कहीं उनके खिलाफ नकारात्मक माहौल न बना दिया जाए। इन ग्रुपों में होने वाली चर्चाएं कई बार व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप का रूप ले लेती हैं, जिससे छवि प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। ऐसे में कुछ अधिकारी “नजर बनाए रखने” की रणनीति के तहत भी जुड़े रहना बेहतर समझते हैं।
हालांकि, यह स्थिति शासन की मंशा के विपरीत मानी जा रही है। अधिकारियों का काम नीतियों को लागू करना और जनहित में निर्णय लेना है, न कि अनौपचारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के दबाव में आकर काम करना। यदि निर्णय लेने की प्रक्रिया पर बाहरी और अनियंत्रित माध्यमों का असर पड़ता है, तो इससे पारदर्शिता और निष्पक्षता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के ग्रुपों की निगरानी और इनके प्रभाव को सीमित करने की आवश्यकता है। साथ ही, अधिकारियों को भी यह समझना होगा कि उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी शासन और जनता के प्रति है, न कि किसी अनौपचारिक डिजिटल समूह के प्रति।देहरादून समेत प्रदेश में तेजी से बदलते इस डिजिटल माहौल में यह मुद्दा अब गंभीर बहस का विषय बनता जा रहा है। क्या प्रशासन ऐसे ग्रुपों के प्रभाव को नियंत्रित कर पाएगा, या फिर ये प्लेटफॉर्म आगे भी इसी तरह दबाव की राजनीति का जरिया बने रहेंगे—यह आने वाला समय ही ।।