देहरादून। उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए सरकार ने खजाना खोलते हुए इस बार दो हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का बजट तो दे दिया, लेकिन लगता है कि इस बजट को खर्च करने की जिम्मेदारी ऐसे सिस्टम के हाथों में है जिसे अभी भी फाइलों से बाहर निकलने की जल्दी नहीं है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में जिन उपकरणों से अस्पतालों की जांच व्यवस्था मजबूत होनी थी, उनके टेंडर ही निरस्त हो गए। यानी मरीजों को राहत मिलने से पहले ही सरकारी व्यवस्था ने खुद ही ब्रेक लगा दिया।
स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि पिछले साल जारी किए गए कई महत्वपूर्ण टेंडर अब फाइलों की धूल बन चुके हैं। उच्च स्तर ने जांच से जुड़े कई अहम उपकरणों के करीब आधा दर्जन टेंडर निरस्त कर दिए। वजह वही पुरानी—कहीं जांच चल रही है, तो कहीं ऊपर से रोक के आदेश हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि जब बजट और जरूरत दोनों मौजूद हैं तो आखिर काम आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा।
दरअसल सरकार की मंशा थी कि राज्य के अस्पतालों में आधुनिक जांच उपकरण लगाए जाएं ताकि मरीजों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें और उन्हें छोटे-छोटे परीक्षण के लिए भी बड़े शहरों का रुख न करना पड़े। लेकिन विभागीय सुस्ती ने इस मंशा को भी फाइलों के ढेर में दबा दिया। अब हालत यह है कि उपकरणों की खरीद से पहले ही टेंडर प्रक्रिया ही दम तोड़ चुकी है।
विधानसभा में भी जब इस मुद्दे की गूंज सुनाई दी तो यह साफ हो गया कि स्वास्थ्य विभाग की यह ‘कछुआ चाल’ अब सदन तक पहुंच चुकी है। जनप्रतिनिधि सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इतने बड़े बजट का क्या फायदा जब विभाग उसे समय पर खर्च ही नहीं कर पा रहा। सरकार की योजनाएं कागजों में तेज दौड़ती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर वही पुरानी धीमी रफ्तार दिखाई देती है। विडंबना यह भी है कि एक तरफ अस्पतालों में मरीजों की लंबी कतारें हैं, डॉक्टर और उपकरणों की कमी की शिकायतें हैं, वहीं दूसरी तरफ विभाग के पास उपलब्ध बजट भी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पा रहा। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है—सरकार की, अधिकारियों की या फिर उन फाइलों की जो महीनों तक टेबल से टेबल घूमती रहती हैं।
सूत्रों की मानें तो कुछ टेंडरों पर जांच चल रही है और कुछ पर उच्च स्तर से रोक लगाने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन जब तक जांच पूरी होगी और नई प्रक्रिया शुरू होगी, तब तक वर्तमान वित्तीय वर्ष का बजट लेप्स हो जाएगा और शायद कई और मरीज सरकारी व्यवस्था से उम्मीद छोड़ चुके होंगे।
अगर स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली इसी तरह सुस्त बनी रही तो वह दिन दूर नहीं जब लोग सरकारी घोषणाओं और बजट के आंकड़ों को सिर्फ कागजी उपलब्धि मानने लगेंगे। क्योंकि जनता के लिए असली मायने उन सुविधाओं के हैं जो अस्पतालों में दिखें, न कि उन टेंडरों के जो फाइलों में शुरू होकर फाइलों में ही खत्म हो जाएं। फिलहाल हालात ऐसे हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए दिया गया बजट तो स्वस्थ दिख रहा है, लेकिन उसे खर्च करने वाला सिस्टम खुद ही बीमार नजर आ रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि इलाज पहले मरीजों का होता है या फिर इस सुस्त व्यवस्था का।
बजट करोड़ों का…. घोषणाएं तेज, सिस्टम सुस्त—टेंडर निरस्त और स्वास्थ्य सेवाएं ठप….!विधानसभा सत्र
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