देहरादून। सिस्टम को नसीहत देने वाले और खुद विवादों में घिरते जा रहे पूर्व कैबिनेट मंत्री व भाजपा विधायक अरविंद पांडे एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार मामला किसी राजनीतिक बयान या प्रशासनिक टिप्पणी का नहीं, बल्कि एक परिवार की जमीन से जुड़ा है, जो अब एसडीएम कोर्ट के बाहर धरना देने को मजबूर हो गया है। पूरा प्रकरण सामने आने के बाद न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि सोशल मीडिया पर भी यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल, कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक व्यक्ति पूर्व मंत्री अरविंद पांडे से भावुक होकर अपनी जमीन न छोड़े जाने की गुहार लगाता नजर आया। वीडियो में व्यक्ति यह आरोप लगाता दिखा कि उसकी जमीन पर प्रभावशाली लोगों की नजर है और वह लगातार दबाव में है। इस वीडियो के वायरल होते ही मामला और तूल पकड़ गया। अब उसी कड़ी में दंपति एसडीएम कोर्ट के बाहर हाथों में तख्तियां लेकर धरने पर बैठ गया है, जिन पर साफ शब्दों में लिखा है— “विधायक अरविंद पांडे हमारी जमीन हमें वापस दो।”
धरने पर बैठे दंपति का कहना है कि उनकी जमीन से जुड़े मामले में उन्हें लगातार न्याय के लिए भटकना पड़ रहा है। उनका आरोप है कि प्रभाव और रसूख के चलते उनकी सुनवाई नहीं हो रही और उन्हें अपनी ही जमीन से बेदखल किया जा रहा है। दंपति का यह भी कहना है कि उन्होंने प्रशासन से लेकर जनप्रतिनिधियों तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन कहीं से भी उन्हें राहत नहीं मिली। अंततः उन्हें मजबूरन सार्वजनिक रूप से विरोध का रास्ता अपनाना पड़ा।
इस पूरे मामले ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर दी है। अरविंद पांडे जैसे वरिष्ठ नेता, जो अक्सर मंचों से सिस्टम को दुरुस्त करने और कानून के राज की बात करते रहे हैं, अब खुद ऐसे आरोपों के घेरे में आ गए हैं। विपक्ष इसे भाजपा की कथित दोहरी नीति से जोड़कर देख रहा है, वहीं सत्तारूढ़ दल के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर असहजता देखी जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल अब सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को लेकर खड़ा हो रहा है। धामी सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि कानून सबके लिए बराबर है और चाहे कितना ही बड़ा नेता क्यों न हो, गलत पाए जाने पर कार्रवाई होगी। ऐसे में यदि इस दंपति की गुहार पर निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई होती है, तो यह सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को और मजबूती देगा। वहीं यदि मामले को नजरअंदाज किया गया, तो सरकार के दावों पर सवाल उठना लाजमी है।
फिलहाल प्रशासन की ओर से मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया का हवाला दिया जा रहा है, लेकिन धरने पर बैठे दंपति को अब सिर्फ ठोस कार्रवाई का इंतजार है। देखना यह होगा कि यह मामला केवल एक वायरल वीडियो और धरने तक सीमित रहता है या फिर सरकार वास्तव में निष्पक्षता दिखाते हुए आरोपों की गहन जांच कर कोई निर्णायक कदम उठाती है। यह प्रकरण न केवल एक परिवार की जमीन से जुड़ा है, बल्कि सत्ता, सिस्टम और न्याय के बीच की विश्वसनीयता की भी परीक्षा है।


