चिपको आंदोलन की वर्षगांठ: जब महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर बचाए थे जंगल, जानें इतिहास

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आज 26 मार्च को दुनिया भर में मशहूर ‘चिपको आंदोलन’ की वर्षगांठ मनाई जा रही है। पर्यावरण संरक्षण का यह अनोखा संघर्ष 1973 में उत्तराखंड के चमोली जनपद के रैणी गांव से शुरू हुआ था। उस समय जब जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही थी, तब गौरा देवी के नेतृत्व में गांव की महिलाओं ने साहस का परिचय देते हुए पेड़ों को कटने से बचाया था। यह आंदोलन न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए पर्यावरण बचाने की एक बड़ी प्रेरणा बन गया। आज इस ऐतिहासिक दिन को याद करते हुए ज्योतिर्मठ में दो दिवसीय ‘चिपको महोत्सव’ का आयोजन भी किया जा रहा है।

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गौरा देवी की अगुवाई में ऐतिहासिक संघर्ष

26 मार्च 1973 को जब साइमन एंड कमीशन के मजदूर 2500 पेड़ों को काटने रैणी गांव पहुंचे, तब गांव के पुरुष मुआवजे के काम से चमोली तहसील गए हुए थे। मजदूरों को आरी और कुल्हाड़ी के साथ आता देख गौरा देवी ने क्षेत्र की महिलाओं को इकट्ठा किया। जब मजदूरों ने उनकी बात नहीं मानी, तो महिलाएं पेड़ों से चिपक गईं और कहा कि “पेड़ों के कटने से पहले हम स्वयं कट जाएंगी।” महिलाओं के इस कड़े विरोध के आगे ठेकेदारों और मजदूरों को हार मानकर वापस लौटना पड़ा।

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चिपको महोत्सव और भारत रत्न की मांग

चिपको आंदोलन की याद में आज से ज्योतिर्मठ के रविग्राम खेल मैदान में ‘चिपको महोत्सव’ शुरू हो रहा है। गौरा देवी पर्यावरण एवं सामाजिक विकास समिति द्वारा आयोजित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, खेल गतिविधियां और पहली बार राज्य स्तरीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। इसी बीच, समिति के अध्यक्ष सोहन सिंह राणा और संरक्षक पुष्कर सिंह ने गौरा देवी के अभूतपूर्व संघर्ष के लिए उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ देने की मांग भी सरकार से की है।

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आज भी कायम है संरक्षण की अलख

गौरा देवी की सहेली ऊखा देवी और उनके परिवार की अन्य महिलाओं का कहना है कि जंगलों को बचाने का जोश आज भी उनमें वैसा ही है। उनका मानना है कि जंगल उनके जीवन का अहम हिस्सा हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस वन संपदा को बचाकर रखना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

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